भीम प्रज्ञा संपादकीय मंथन- एडवोकेट हरेश पंवार
क्या आदरणीय, फादरणीय लगा रखी है। उन मानसिक रोगियों का मानसिक कचरा आप अपने दिमाग में ठूंस कर उन्हीं का महिमामंडन कर रहे हो। यह ठीक बात नहीं है। क्यों न अपने दिमाग के ताले खोल कर आत्म मंथन कर लेते। क्या आपने सोचा आपका अपना मजबूत मीडिया तैयार करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएं। यह फॉरवर्ड फॉरवर्ड मैसेज भेजने से कोई भला नहीं होने वाला। किसी एक व्यक्ति ने जवाब क्या लिख दिया। सारे ग्रुप में बकरी की तरह मिगनी बिखेरते फिर रहे हैं। और सारे ग्रुप में एक ही पोस्ट घूम रही है। इनसे क्या सार निकलता है। कुछ थोड़ा बहुत चिंतन मंथन आप भी कर लेते।, कोई टीका टिप्पणी, अपना पराया कुछ तो लिखो। कोई दिशा दशा के बारे में किसी मुद्दे पर तो चिंतन हो। मुझे तो लगता है की पत्रिका वालों ने आपको सुपारी देकर अपने तथाकथित मिशनरी ग्रुप में अखबार की टीआरपी बढ़ाने का कार्य करवाया हो। उनके अखबार का लोगो लगा कर विरोध जताकर आरक्षण विरोधी लोगों को पत्रिका के समर्थन में जागरूक करने का काम कर रहे हो। आप पत्रिका को देते भी क्या थे ₹130 महीने में ही पढ़ रहे थे। अब वे देंगे पत्रिका को माल आपके खिलाफ जहर उगलने के लिए। उनका देखना कमाल। विज्ञापनों की झड़ी लगा देंगे। आप कगलों की पत्रिका गुलाम होती तो कभी के पांव पकड़कर माफी मांग लेती। जानते हो तुम्हें जलील करके अलवर में माफी मांगी थी। याद है ना माफी के नाम पर भी तुम्हें कैसे जलील किया। मुझ पर आग बबूला क्यों हो रहे हो ? पत्रिका वालों से ज्यादा जहरीले शब्द तो मैं कुछ लिख नहीं रहा हूं। अपनों के लिए अपनी शिकायत है। अधिकार बनता है तो लिख रहा हूं। समाज की रोटी खाता हूं समाज का गीत गाता हूं फिर इतना तो कहूंगा। आपको बुरा लगे तो लगे। माफ करना यह कर्मचारी अधिकारी अनुसूचित जाति जनजाति अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षित वर्ग का सामाजिक संगठन का प्लेटफार्म है। मुझे बोलने का अधिकार नहीं है। फिर भी आप लोगों ने मुझे इस ग्रुप में शामिल कर अपनी बात कहने का अधिकार दिया है। तो जरूर बोलूंगा। मैं न अधिकारी हूं न कर्मचारी हूं। मैं तो एक महज पत्रकार हूं। मैं तो साफ-साफ शब्दों में कहता हूं। किसी भाई को मिर्ची लगे तो लगे। मैं तो साफ शब्दों में कहता रहूंगा। आप पत्रिका के मानसिक कचरा को जान पूछकर टीआरपी देने का काम आप लोग कर रहे हैं। वे अपना काम कर रहे हैं। आप अपना काम क्यों नहीं करते ? 2 दिन से किसी बंधु ने आपका अपना मीडिया खड़ा करने की पोस्ट तक नहीं डाली। देश में छोटे-छोटे लघु पत्र पत्रिकाएं संघर्ष की राह में झुज रहे हैं। इस लाॅक डाउन के बाद अंबेडकर मिशन की 80% पत्र पत्रिकाएं स्वत: ही दम तोड़ देंगे। उनके बारे में आपने क्या सोचा? यदि सच में आप राजस्थान पत्रिका का विरोध कर रहे हैं। तो कीजिए बंद और उसके बदले में दीजिए आपके अपने स्थानीय मिशनरी पत्र पत्रिका को आर्थिक सहयोग ? इसमें मैं अपना स्वार्थ नहीं ढूंढ रहा हूं। कलम का सिपाही हूं। मिशनरी पत्रकारिता के मैदानी जंग में उत्तरा हूं। सब हुनर जानता हूं। विषम परिस्थितियों में साप्ताहिक की जगह दैनिक रूप में भीम प्रज्ञा के माध्यम से आप ढाई लाख से अधिक लोगों के मोबाइल में हर रोज दस्तक देता हूं। किसी बात की चिंता नहीं सब आर्थिक युक्तियुक्त प्रबंधन के साथ विषम परिस्थितियों में संघर्ष करने के आदी हैं। मासिक से पक्षिक और पाक्षिक से साप्ताहिक और अब साप्ताहिक से दैनिक प्रकाशन की दिशा में कदम रख रहे हैं। सब चिंताओं से दूर आ बैल मुझे मार के मार्ग पर सीना तान कर चल रहे हैं। आपके अभिमान के साथ आपके स्वाभिमान के साथ परंतु जो साथी पत्रकारिता के मैदान में उतरे थे विषम परिस्थितियों में थक गए हैं कम से कम उन्हें ही संबल दे देते। जागो समाज बंधुओं जागो। उन संपादकों प्रकाशकों को अपने स्क्रीन शॉट के साथ अपना पूरा पता मोबाइल नंबर सहित उन्हें भेज कर सूचित कीजिए। फिर देखते हैं मिशन कैसे आगे बढ़ेगा। यदि आपने ऐसा करना शुरू कर दिया तो यह उन पर आपका एहसान नहीं? आप अपना फर्ज अदा कर रहे हैं। तब जाकर लगेगा आप समाज में बदलाव लाना चाहते हैं। वरना तो फोकट की सोशल मीडिया में लूडो खेलते नजर आए तो समझेंगे कि आप पत्रिका की सही मायने में अजेंट हैं।। राजस्थान पत्रिका का विरोध करना कोई छोटी बात नहीं है? आप ऐसा नहीं कर सकते। मैं दावे के साथ कह रहा हूं । मुझे सब पता है ।आप ऐसा नहीं करोगे। कल सुबह से मुझे 20 से अधिक लोगों ने फोन किया है। वे हमारे अंकुरित अखबार की टीआरपी टटोल रहे हैं। खुफिया एजेंसी के तरह से ।हमारी जांच पड़ताल कर रहे हैं।कई शेर के पट्ठे ने तो हमारा पोस्टमार्टम तक कर डाला है। यारों का एक धेला का सहयोग नहीं। उल्टा उपदेश देने लगे हैं। जैसे पत्रकारिता में पीएचडी किए हुए हो। महज लगे रहो बहुत अच्छा खूब शानदार शब्दों के साथ पल्ला झाड़ कर या व्हाट्सएप पर अंगुठा दिखाकर रफू चक्कर होते नजर आते हैं। उनके उपदेश के बाद मानो हमारे खेत में गन्ने की फसल उपज जाएगी। वाह भाई वाह हम भी कितने कूल है। अखबार में हम कितना ही अच्छा लिख दे। आपको पसंद नहीं। बाकी पत्रिका जैसे अन्य अखबार वालों ने चाहे आपको कितना हतोत्साहित वह जलिल करने वाली खबरों में बलात्कारी का हमदर्दी बताकर आपका नाम जोड़ दें तो आप घमंड से अपनी कमीज की कॉलर उठा कर गर्व से सोशल मीडिया पर पोस्ट चिपका देने में अपनी शान समझते हैं।
साहब आग बबूला होने की जरूरत नहीं। मैंने कोई कड़वा नहीं कहा सीने में आग धधक रही थी। आप तक बफारे आ गई तो मैं क्या करूं ? आप चाहकर भी पत्रिका का विरोध नहीं कर सकते ? मैं दावे के साथ कह रहा हूं। केवल अपने अपने ग्रुप में ही पोस्ट कर रहे हो क्योंकि आप कर्मचारी हैं । क्योंकि आप अधिकारी हैं। उनके पास भी आपको बैठना उठना है। पत्रिका के स्थानीय पत्रकार से आपके अच्छे लाइजन हैं। होली दिवाली विज्ञापन भी देना होगा। लिफाफा भी देना होगा। ऐसा हमारे साथ नहीं करोगे। क्योंकि हम आपके साथ ऐसी घिनौनी हरकतें कर नहीं सकते। वह तो बेटी का बाप आप के खिलाफ कुछ उल्टी सुल्टी कुछ छाप दे। इसलिए सब ध्यान रखना पड़ता है। नौकरी करना कोई छोटी बात थोड़ी है।सबको सेट करके रखना पड़ता है ना साहब । हमारा तो क्या है ? हम तो फक्कड़नाथ हैं । हमें न ट्रांसफर की चिंता है। न प्रमोशन की चिंता। बस चिंता तो है तो आपकी है। समाज की है। जब से प्रमोशन में रिजर्वेशन पर नंगी तलवार लटकाकर व्यवस्था के मीडिया ने कुठाराघात करना शुरू किया। तो हमने अपने सपनों के सब ड्रीम प्लान का पटाक्षेप कर दिया। जब हम कंपटीशन की तैयारी में जुटे हुए थे। आप जैसे अधिकारी कर्मचारी बनने के सपने संजोए हुए थे। बस आंख बंद कर उन सब डिग्रियों के पुलन्दे को झोले में बंद कर पत्रकारिता के मैदान में कूदे पड़े थे। जब आपने कहा कि हमारा मीडिया नहीं उस दिन से कलम के सिपाही बनकर भीम प्रज्ञा अखबार की अनवरत यात्रा में निकल पड़े। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। के साथ मासिक पत्रिका से शुरू होकर आज पिछले 1 महीने से लॉक डाउन और करोना के कहर में विषम परिस्थितियों में आपकी अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए ।दैनिक अखबार की दिशा में रोज लिख रहा हूं। 11 साल के इस संघर्ष के राही को आपकी सलाम दुआएं मिले या ना मिले इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप समाज की जाजम पर आगे बिठाते हैं या पीछे बैठ आते हैं। कभी चिंता नहीं की। हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जब मैदान -ए-जंग में आ ही गए हैं तो कबड्डी में काका कि क्या लाज रखेंगे। बस अब तो काका को चित करना है तो करना है ? पत्रकारिता के माध्यम से समाज को आइना दिखाना है। यनि हमारा काम आपके चुटका भरना है । आप खुजलाएं या झुंझलाएं। आपके कितना दर्द होता है या नहीं। आप प्रतिरोध में खड़े होते हैं या नहीं। यह सब आप पर निर्भर करता है। आप मुझे कितनी गालियां दोगे या शाबाशी इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। कभी मीठा खाएंगे तो कड़वा दिखाना पड़ेगा। यह सब हम जानते हैं। हमारा उद्देश्य कलम से क्रांति लाना है। बाकी आपकी मर्जी। अपनी जेब में हाथ डालकर फिर दिल मसोस रहे हो तो यह आपकी मर्जी। हम अपना काम कर रहे हैं। आप कब से करना शुरू करोगे यह तो आप जाने।
आज इतना ही बाकी कल।
आपका अपना
एडवोकेट हरेश पंवार
संपादक भीम प्रज्ञा झुंझुनूं।
9983 040937